पटना जंक्शन (Patna Junction)के प्लेट फ़ॉर्म नंबर पांच पर वैद्य (Ayurvedic Doctor)सुधीर कृष्ण, कुछ बदहवास से भटक रहे थे । उन्हें यह पता नहीं चल पा रहा था कि गया (Gaya City , Bihar)जाने वाली ट्रेन किस प्लेटफार्म पर आती है । अचानक उनकी निगाह एक औरत पर जाती है जिसके गोद में एक छोटा बच्चा था और एक छह साल का बच्चा उसकी उंगलियां पकड़े ट्रेन की बोगी की तरफ चला जा रहा था ।
उस औरत के पीछे पीछे एक और व्यक्ति था जिसके हाथ में एक भारी बैग था और कंधे पर एक बॉक्स। वैद्य सुधीर कृष्ण ने उस औरत को गौर से देखा ।
“ अरे यह तो सुनीता है !! “ डॉक्टर साहेब यानी सुधीर कृष्ण चौंक गए । उनके सारे बदन में एक अजब सी सनसनी दौड़ गई । वह सुनीता की तरफ भागे और उसके करीब जाकर उसे टोका ।
अरे वैद्य जी आप ?! “ सुनीता की आंखों में हर्ष मिश्रित हैरत झलक आई और थोड़े बहुत आंसू भी छलछला निकले । वह कुछ पल बेसुध सी सुधीर को देखती रही और फिर जब कुछ सुध आई तो झट अपने बच्चे से कहा “ अरे सुमित , डॉक्टर साहेब के पैर छू !! “ उसका लड़का सुमित ने ठीक वैसा ही किया जैसा उसकी मां ने कहा ।
अब बारी उसके पति नंदकिशोर की थी । उसने पहले अपना सारा सामान प्लेटफार्म के फ्लोर पर रखा । दो कदम आगे बढ़ा । दोनों हाथों से सुधीर कृष्ण के पांव छुए फिर दो कदम पीछे जाके हाथ जोड़ खड़ा हो गया । उसके चेहरे पर एक अनुग्रहित व कृतज्ञता के भाव थे ।
“तुम लोग भी गया जा रहे हो क्या ? “ सुधीर ने पूछा और गाड़ी की तरफ बढ़ गया। सुनीता का परिवार भी पीछे लग गया।
“हां मेरी बहिन का बियाह है। गया में !! सुनीता जवाब देते हुए मुस्कुराई ।
गर्मी का मौसम था । गाड़ी के बोगी में उमस के कारण ज्यादातर मुसाफिर ऊंघ रहे थे । इसी दौरान सुधीर कृष्ण की नजर सुनीता से मिली । वह प्यार से मुस्कुराते हुए उसे ही देख रही थी । और जब उन दोनो की निगाह आपस में मिलीं तो सुनीता ने एक शरारती मगर चुपके का इशारा अपने बड़े बच्चे की तरफ किया ।
सुनीता के इस इशारे का मतलब था कि उस बच्चे की सूरत कुछ कुछ वैद्य सुधीर कृष्ण से मिलती थी ।
साइंस बायो (Biology )से ग्रेजुएशन करने के दो वर्ष बाद भी जब सुधीर को नौकरी(Jobs) या रोजगार(Self Employment)का कोई अच्छा इंतजाम न हुआ तो उसके मामा पंडित विष्णु नारायण ने अपने एक पुराने मित्र वैद्य नेकचंद , आयुर्वेद रत्न , के नाम एक पत्र लिखा और सुधीर को देते हुए बोले की उन्हीं के पास जा और औषधि चिकित्सा (Herbal Treatment)का काम सीख।
भले ही वे नवादा(Nawada district, Bihar) जैसे छोटे कस्बे में रहते हों मगर उनके जोड़ का कोई वैद्य इंडिया में नहीं है।
मामा जी ने नवादा शहर के जिस लोकेशन का जिक्र किया था वहां वैद्य नेकचंद नहीं मिले । सिर्फ किराने की एक पुरानी दुकान (Grocery store)मिली । जहां एक छोटे कद का बूढ़ा सा व्यक्ति दुकान के गल्ले पर बैठा ऊंघ रहा था। पूछने पर उसने बताया कि वही वैद्य नेकचंद है और वह किराने की दुकान उसके बेटे की है जो खाना खाने गया है।
अपने पूर्व मित्र पंडित विष्णु नारायण का पत्र पढ़कर नेकचंद जी बहुत खुश हुए और सुधीर को आश्वस्त किया कि वे उसे आयुर्वेद चिकित्सा (Ayurveda Medicines)संबंधी वह सारी जानकारी दे देंगे जितना वो जानते हैं क्योंकि उनके बेटे को इस विषय में कोई रुचि नहीं । उसके लिए किराना दुकान ज्यादा फायदेमंद है।
उस किराने दुकान के एक किनारे वैद्य नेकचंद की क्लिनिक(Ayurvedic Clinic)थी । जिसका बोर्ड इतना पुराना और धूमिल था कि पढ़ा नहीं जाता था कि उस पर क्या लिखा है । उनकी क्लिनिक भी अंदर से काफी गंदी और अस्तव्यस्त हालत में थी। जाहिर था कि वैद्य नेकचंद ने अपनी प्रैक्टिस लगभग बंद कर दी थी। हां, किसी किसी रोज जो भी मरीज आते उन्हें वैद्य जी दवा की पुडिया किराने की ही दुकान में दे देते ।
वैद्य नेकचंद के निर्देश पर सुधीर ने सबसे पहले क्लिनिक की साफ सफाई की । सभी जड़ी बूटियों (Herbal plants)के डब्बे को करीने से सजाया । और पुराने बैनर को हटा कर फ्लेक्स का एक नया आकर्षक बोर्ड बनवाया । जिसपर सारी बीमारियों के उपचार का जिक्र था। यह नया फ्लेक्स बोर्ड इतना आकर्षक था कि हफ्ते दो हफ्ते के अंदर ही अंदर मरीजों के विजिट का तांता लग गया । वैसे भी नवादा शहर और उसके आसपास के इलाकों में वैद्य नेकचंद के शर्तिया इलाज की काफी प्रसिद्धि रही थी और लोग उनके उपचार पर काफी भरोसा रखते थे।
उस एक से दो महीने की ट्रेनिंग पीरियड में वैद्य जी ने सुधीर को अपने संग्रह की कई आयुर्वेद की किताबें पढ़ने को दीं। जानी अनजानी कई जड़ी बूटियों और उसके महत्व से परिचित कराया। और उनकी औषधि बनाना सिखाया। एक मिश्रक (कंपाउंडर) के रूप में सुधीर कृष्ण इतनी जानकारी हासिल कर चुका था कि वैद्य नेकचंद की गैरहाजरी में भी विभिन्न किस्म के विजिटिंग मरीजों का इलाज कर लेता । नेकचंद शायद यही चाहते भी थे। सुधीर क्लिनिक से होने वाली आय का सिक्सटी फीसदी हिस्सा वैद्य जी को देता और चालीस फीसदी आय अपने पास रख लेता।
उक्त क्लिनिक के पिछले हिस्से में एक और कमरा था जिसमें एक देहाती ढंग का ,चपाकल युक्त वाशरूम अटैच्ड था। भोजन पानी की व्यवस्था वैद्य जी के घर से हो ही जाती थी। कुल मिलाकर सुधीर कृष्ण का करियर पूरी शानदार तरीके से सेट हो चुका था ।
मई महीने की एक गर्म भरी दुपहर में एक युवा दंपती ने क्लिनिक का भ्रमण किया । वह खूबसूरत सांवली सी महिला जिसके नैन नक्श काफी तीखे से थे और वह वैद्य जी को पहले से जानती थी । शुरू में सुधीर को देख उसे कुछ संकोच हुआ लेकिन नेकचंद ने जब बताया की वह उनका मिश्रक(Compunder )है तो उसने सहज होकर यह बताया की उसके पति को चर्म रोग(Skin Diesese)है और शरीर की ऐसी जगह है जहां बताने में उसे संकोच अनुभव हो रहा है । बहरहाल, उसके पति नंदकिशोर का उपचार प्रारंभ हुआ। उसके लिए सुधीर ने विशेष किस्म की जड़ी बूटियों और रस रसायन मिश्रित एक लेप वाली औषधि(Lotion )तैयार कर उसके निरंतर प्रयोग की हिदायत दी । तथा एक सप्ताह बाद दुबारा मिलने को कहा ।
इस तरह सुनीता हर हफ्ते नेकचंद के क्लिनिक आने लगी। कभी किसी हफ्ते उसका पति नंदकिशोर भी आता और दवा से होने वाली संतुष्टि जाहिर करता । लेकिन इसी दौरान के एक खूबसूरत लम्हे में । जब बाहर बारिश हो रही थी । सुनीता ने अपनी आंखों से और फिर बातों से स्पष्ट कर दिया दिया की वह सुधीर से प्यार करने लगी है। 
खैर , सुनीता, जो पहले सिर्फ अपने पति की दवा के लिए आती थी अब अपने महबूब से मिलने के नित नए बहाने तलाशने लगी ! उसकी प्रेम की बेचैन रूह को एक करार आने लगा ।
और इधर सुधीर कृष्ण को जैसे एक मनोरंजन का सुलभ साधन मिल गया। वैसे भी , वैद्य नेकचंद अपनी क्लिनिक में कम ही आते और ज्यादातर समय ऊपर अपने कमरे में आराम करते । 
किराने की दुकान की हालत खस्ता हो रही थी । क्योंकि नेकचंद के बेटे की रुचि किराने की दुकान से हटकर किसी और बेहतर धंधे की तलाश में लग गई थी। इसलिए किराने की दुकान को चलाने का जिम्मा नेकचंद की बहु मंजू पर आ गया था ।
एक दुपहर जब सुनीता और सुधीर क्लिनिक के पीछे वाले कमरे में आलिंगनबद्ध थे तो मंजू ने उन्हें देख लिया ! वह शायद सुधीर को दिन के भोजन के लिए बुलाने आई थी । मगर यह दृश्य देख वापस लौट गई। सुधीर भी काफी डर गया उसने सुनीता को आगे यहां आने से मना किया और वादा किया कि वे दोनों किसी और जगह मिलते रहेंगे ।
सुधीर कृष्ण की खराब किस्मत बस यहीं नहीं रुकी । एक सुबह एक अशुभ सूचना मिली की वैद्य नेकचंद का देहांत हो गया है !
नेकचंद के देहांत के एक महीने बाद ही नेकचंद का बेटा और बहू सुधीर के क्लिनिक में आए और दुकान खाली करने को कहा । उन्होंने सिर्फ कहा ही नहीं बल्कि उसी रात उसके बैग बैगेज को सड़क पर फेंक दिया और क्लिनिक के पोस्टर वगैरह फाड़ कर दरवाजा अंदर से बंद कर दिया।
सुधीर कृष्ण ने किसी तरह बस अड्डे पर रात गुजारी । सुबह को जब वह सुनीता के घर पहुंचा तो उसके पड़ोसी ने बताया की वे लोग दानापुर चले गए हैं । नंदकिशोर को वहीं काम मिल गया है। सुधीर कुछ पल तक वहीं खड़ा सोचता रहा कि अब वह कहां जाए? उसने अपने निवास पटना जाना मुनासिब न समझा! क्या जवाब देता वह अपने मामा जी को ? अवैध प्रेम के भेद खुलने से उसकी बदनामी हो जाती।लिहाजा , उसने मुजफ्फरपुर का बस पकड़ा। एक दोस्त की सहायता से अब वह वहीं अपना चिकित्सा केंद्र (Treatment Centre)चलाएगा।
गया स्टेशन आ चुका था । सुधीर कृष्ण के मन में एक बार आया की वह सुनीता को मुजफ्फरपुर ले चले । लेकिन अचानक एक अधेड़ व्यक्ति कहीं से आ धमका । सुनीता उसे देख बहुत खुश हुई। और उससे लगभग लिपट चिमट कर बातें करने लगी ।
सुधीर ने गौर से देखा और हैरत में पड़ गया ! सुनीता की गोद में जो बच्चा था उसकी शक्ल उस आदमी से हुबहू मिलती थी।
तो क्या …? सुधीर ने सोचना बंद कर दिया और एक झटके से स्टेशन के बाहर निकल गया । उसे अपने औषधि की बिक्री के सिलसिले में किसी से मिलना था।
Writer: Satish Tiwari / सतीश तिवारी
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