Sunday, September 29, 2024

Hindi Story: A tale of an unfortunate Love |एक बदनसीब मुहब्बत की दास्तान !!

Love story: एक बदनाम मुहब्बत की दास्तान / A tale of an unfortunate Love!
"इस दुनिया में प्रेम के कई एक ऐसे किस्से रहे हैं जिन्हे कोई सुनना नहीं चाहता बस उसे नजरंदाज कर देना चाहता है या जल्दी से भुला देना चाहता है !"
वह बड़ा सा मार्केट कॉम्प्लेक्स देख रहे हैं न आप ! हां वही गहरे हरे रंग और चमकदार शीशे की खिड़कियों वाली ? आज से तकरीबन तीस पैंतीस साल पहले इसी जमीन पर दो अलग अलग मकान हुआ करते थे । एक मकान श्रीधर पाठक जी का था और यह सामने वाला मजूमदार साहब का । 
जब देश को नई नई आजादी मिली थी और पंडित नेहरू के नेतृत्व में भारत धीरे धीरे अपने पैरो पर खड़ा होना सीख रहा था तो श्रीधर पाठक और जी के मजूमदार के के पिता जी लोग भी पटना शहर के इस इलाके में आकर बस गए थे । इत्तिफाकन, यह दोनों के दोनों बिहार सरकार के सचिवालय में क्लर्क के रूप में बहाल हुए थे ।
ओल्ड सेक्टेरियट के आज पास यही गर्दनीबाग, यारपुर ,मीठापुर में तब मकान के लिए जमीनें काफी सस्ती मिल रही थीं और बड़ी तादाद में सचिवालय के कर्मचारी यहां बस रहे थे। 
श्रीधर पाठक और जी के मजूमदार ने जब ग्रेजुएशन कर लिया तो संयोग से दोनों की नौकरी पोस्ट एंड टेलीग्राफ(Post & Teligraph )डिपार्टमेंट में हो गई। जब बचपन के दो यार एक ही डिपार्टमेंट में काम करते हों और पड़ोसी हों तो परिवारिक लगाव और संबंध की बात ही अलग होती है।

खैर ,श्रीधर पाठक के दो लड़के थे और एक लड़की । बड़ा लड़का दिल्ली यूनिवर्सिटी(Delhi University)में पढ़ाई कर रहा था और कभी कभी ही पटना आता था । लड़की संगीता  मगध महिला कॉलेज में बीए कर रही थी और छोटा लड़का मुकुल ने पटना हाई स्कूल से मैट्रिक की परिक्षा पास कर पास के बीड़ी इवीनिंग कॉलेज में दाखिला लिया था। मुश्किल से सेकंड डिवीजन पास करने पर उसे पटना के अन्य प्रतिष्ठित कॉलेज में दाखिला नहीं मिल पाया था जिसका श्रीधर पाठक को दुख था मगर किसी तरह उसके करियर का बेड़ा पार हो जाए यही तमन्ना उनके दिल में थी ।

वैसे देखा जाए तो मुकुल को नए जमाने की हवा लग गई थी। बुरी संगत में वह आवारागर्दी पर उतर आया था। भाग भाग कर सिनेमा देखना। लड़कियों के कॉलेज ,स्कूल के इर्द गिर्द मटर गस्ती करना आदि आदि। लेकिन बहन संगीता का दुलारा भाई था । उसे वह बहुत मानती थी।
इधर जे के मजूमदार साहब की सिर्फ दो लड़कियां थीं। बड़ी वाली लड़की शेफाली की शादी हो चुकी थी और वह कोलकाता(Kolkata )में रहती थी । छोटी मिताली ने मुकुल के साथ ही मैट्रिक का इम्तिहान पास किया था और वह पटना कॉलेज(Patna College )में इंटरमीडिएट आर्ट्स की पढ़ाई कर रही थी।
मिताली और संगीता दोनों काफी घनिष्ट फ्रेंड्स थीं। उन दोनों की मित्रता एक पड़ोसी से भी ज्यादा एकदम दो बहनों वाली रही थी । यानी साथ साथ कहीं आना जाना ,घर की छत पर देर रात तक बातें करना । घर की बनी सब्जी ,नमकीन का अदान प्रदान करना आदि आदि।

इसी बीच क्या हुआ की जब मुकुल के प्रेम की दाल अन्य किसी लड़की के दिल में नहीं गली तो अचानक एक दिन उसने मिताली को गौर से देखा “ अरे यार यह भी प्यार के काबिल है ! क्या गजब का जवां हुस्न। बड़ी बड़ी  आंखें।  खूबसूरत तरन्नुम बिखेरती आवाज और हंसना उसका । बहरहाल मुकुल अपनी इस दिलकश अदाओं वाली प्रेमिका की डिस्कवरी पर बेहद प्रसन्न थे और अगला कदम उठाने को योजना पर विचार करने लगे ।

शुरुआत में तो मिताली मुकुल के प्रेम भरे इशारों और छेड़खानियों को महज एक मजाक समझ नजरंदाज करती रही परंतु जब प्रेमपत्र आने लगे तो वह गंभीर हो गई । वह चाहती तो संगीता से मुकुल की शिकायत कर सकती थी लेकिन संकोच में ऐसा नहीं कर सकी। एक बार उसने अकेले में मुकुल को समझना चाहा मगर मुकुल ने उसे बाहों में भर कर चूम लिया । बस मुहब्बत की जमी बर्फ यहीं से पिघलने लगी । दोनो अपने अपने घर वालों की नजर से बचकर मिलने लगे । कभी छत पर ,कभी सीढ़ियों पर कभी पीछे वाली गली में।

माफ कीजिएगा मैं इस कहानी के दो अन्य चरित्रों के बारे में ऊपर जिक्र करना भूल गया था जिनका किरदार अब अहम हो गया है । यह है मधु पाठक और रानी मजूमदार । मधु जैसा इनके नाम के टाइटल से जाहिर है श्रीधर पाठक की धर्मपत्नी थी और खाटी किस्म की ग्रामीण मिजाज वाली महिला थीं । उधर रानी मजूमदार एक पढ़ी लिखी महिला थी । और जैसा आमतौर पर एक आधुनिक बंगाली महिला होती है उसी तरह की थीं 
यानी स्वच्छंद विचारो वाली । अपने बच्चों से कभी टोकाटोकी नहीं करतीं।

इसी दौरान मधु जी को शक होने लगा था कि उनका बेटवा मिताली पर लाइन मार रहा है और मिताली उसे छूट दे रही है। “ ये बंगाली औरतें जादूगरनी होती हैं अपनी आंखों और लच्छेदार बातों से बिहारी मर्दों को फंसा लेती हैं!! “ वर्षों पहले जब बड़कू , अर्थात बड़ा बेटा सात आठ साल का था तो उन्हे ऐसा शक रानी मजूमदार पर भी हुआ था कि पाठक जी दिन रात रानी के चुहानी में घुसे उनसे प्रेमपूर्ण बातें करते मिले थे । मगर यह बहुत पुरानी बात है। नई बात यह है की मुकुलवा मिताली को हड़सने के फेर में लगा है। किंतु उनकी बेटी संगीता उन्हे हर बार डांट देती और ऐसी देहाती सोच से बाहर आने की सलाह देती थी ।

इसी बीच क्या हुआ कि बिल्ली के भाग्य से छींका टूट गया । संगीता की शादी ठीक हो गई । लड़केवालों ने पाठक परिवार को छेके की रस्म अदायगी के लिए बनारस(Banarasi )बुलाया। क्योंकि लड़का बनारस का ही था और इलाहबाद में सरकारी मुलाजिम था।परंतु मुकुल ने अवसर की नजाकत समझ एक जोरदार ,अकाट्य बहाना बनाया और घर पर रह गया। 

उस दिन सुबह से ही हल्की और तेज बारिश हो रही थी। मौसम का ईमान बिगड़ा बिगड़ा सा था। रोमांस की हसरतें बेलगाम हो रही थीं । उसने मिताली को चुपके से अपने घर पर बुलाया और सबसे अलग कमरे में ले गया । दोनों प्रेमी जोड़े काफी देर तक एक दूसरे से चिपके रहे । मगर मुकुल इस हद से आगे बढ़ना चाहता था। मिताली को इस पर कोई आपत्ति नहीं हुई बल्कि वह तो कुछ और हद से गुजरने की कोशिश करने लगी। बाहर आसमान में बादलों और बरसात की फुहार ने भी इन दो जिस्मों के मिलन के लिए समा बांध रखा था ।

कि अचानक मिताली फर्श पर गिर पड़ी। उसके हाथ पैर कड़े हो गए और शरीर नीला पड़ने लगा । शुरू में मुकुल को लगा कि मिताली कोई नखरे दिखा रही है। मगर नहीं ,वह तो निश्चल पड़ गई है । मुकुल घबरा कर उसे हिलाने डुलाने लगा “ मिताली मिताली उठो ! क्या हो गया तुम्हें? किंतु मिताली नहीं उठी। वह मर चुकी थी

मुकुल के होश उड़ गए । वह पागलों की तरह घर में इधर से उधर भागने लगा और रह रह कर मिताली के मरे हुए ठंडे जिस्म को हिला हिला कर देखने लगा कि शायद उसे होश आ जाए।

मुकुल इतना तो समझदार था कि वह मौत, हत्या ,पुलिस केस ,अपने और अपने परिवार की बदनामी समझता था। वह एक झटके से मिताली की लाश के पास से उठा और भाग कर पापा की दाढ़ी बनाने वाली एक ब्लेड ले आया। फिर बेपनाह रोते और चीखते हुए अपनी कलाई की नस काट डाली।
जब तक उसके शरीर से खून बहते रहे और प्राण पखेरू न उड़े वह अपनी परम प्रिय प्रेमिका मिताली का चेहरा देखता रहा।

काफी देर हो जाने के बाद रानी मजूमदार पाठक जी धर आईं और आशिकी के ऐसे दर्दनाक अंत का यह नजारा देख वहीं बेहोश हो गईं। जब सुध आई तो जी के मजूमदार को पास खड़े रोते बिलखते पाया । आगे क्या हुआ होगा इस वृतांत में जाने की जरूरत मैं नहीं समझता। हां पुलिस की छानबीन के दौरान ही जी के मजूमदार साहब को हार्ट अटैक आया और वे भी स्वर्ग सिधार गए। 
पाठक जी सूचना मिलने पर पटना आए पर घर जाने के पूर्व वो अपने एक संबंधी जो राज्य पुलिस के डीजीपी थे मिले और इस चक्करदार मामले को त्वरित गति से रफा दफा करवाने में सफलता पाई । सफलता ? यह शब्द नहीं तो कौन सा शब्द आपके विचार से यहां इस परिस्थिति में फिट बैठता है?


आज लगभग एक दशक बाद मैं पटना लौटा हूं और उसी मुहल्ले के एक होमियोपैथिक डॉक्टर मित्र से मिलने आया हूं। उन्होंने बताया की किसी राजनाथ यादव ने यहां यह मार्केट कॉम्प्लेक्स बनवाया है। राज नाथ के पिता  बिगू यादव जो उस जमाने में इस इलाके के बड़े डॉन थे उन्होंने सबसे पहले रानी मजूमदार को डरा धमका कर उनका मकान सस्ते में खरीदा और फिर पाठक जी को भी बहला फुसला कर उनका मकान अच्छे दाम पर खरीद लिया

रानी मजूमदार उसके बाद अपनी बेटी शेफाली के पास कोलकाता चलीं गई और पाठक जी अपनी पत्नी के साथ बनारस रहने लगे। यह नेक और उचित सलाह उनके बड़े बेटे ने दी थी जो आस्ट्रेलिया में रहता है ।” और संगीता ? उसका क्या हुआ डॉक्टर साहब ?”

“उस घटना के बाद संगीता की शादी कैंसिल हो गई थी इतना पता है आगे का हमे नहीं मालूम । “

Writer: Satish Tiwari / सतीश तिवारी 













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